वैदिक ज्योतिष में राहु और केतु को छाया ग्रह कहा जाता है। आकाश में इनका कोई ठोस पिंड नहीं है। ये वे दो बिंदु हैं जहां चंद्रमा का मार्ग सूर्य के मार्ग को काटता है। राहु केतु पूजा त्र्यंबकेश्वर में एक दिन का अनुष्ठान है, जिसमें आपके नाम और गोत्र से संकल्प लेकर इन दोनों ग्रहों की पूजा और जाप किया जाता है।
पुराणों की कथा के अनुसार समुद्र मंथन से निकला अमृत जब बांटा जा रहा था, तब स्वर्भानु नाम का असुर देवताओं की पंक्ति में जा बैठा। सूर्य और चंद्र ने उसे पहचान लिया और भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। अमृत गले तक पहुंच चुका था, इसलिए दोनों भाग जीवित रहे। सिर राहु कहलाया और धड़ केतु।
इस अनुष्ठान को कई लोग राहु केतु शांति भी कहते हैं। जब ज्योतिषी कुंडली की किसी बात को इन ग्रहों से जोड़ते हैं, तो इसे राहु केतु दोष पूजा के नाम से भी जाना जाता है। नाम कोई भी हो, भाव एक ही है: ग्रहों के प्रति श्रद्धा से प्रार्थना करना और मन की स्थिरता मांगना। इस पैकेज का मुख्य अंग राहु केतु जाप है, जिसमें दोनों ग्रहों के मंत्रों का विधिपूर्वक जाप होता है।
मिलती-जुलती पूजाओं से अंतर
- कालसर्प पूजा आम तौर पर तब चुनी जाती है जब ज्योतिषी बाकी सातों ग्रहों को राहु और केतु के बीच बताते हैं। राहु केतु पूजा में इन्हीं दो ग्रहों की आराधना होती है।
- महामृत्युंजय जाप भगवान शिव को समर्पित मंत्र का जाप है, जिसे परंपरा में स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना के लिए चुना जाता है।
- कुंभ विवाह मांगलिक दोष और विवाह मिलान से जुड़ा एक अलग अनुष्ठान है।
कौन सा अनुष्ठान आपके लिए ठीक रहेगा, यह तय न हो पाए तो बुकिंग के समय अपना जन्म विवरण देकर गुरुजी से पूछ सकते हैं। तैयार हों तो शुभ मुहूर्त देखें और बुकिंग के लिए गुरुजी से संपर्क करें।